अरसा: उत्तराखंड की पारंपरिक मिठाई और इसकी रोचक कहानी

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अरसा: उत्तराखंड की पारंपरिक मिठाई और इसकी रोचक कहानी

अरसा एक पारंपरिक मिठाई है, जो उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यह मिठाई चावल, गुड़ और घी से बनाई जाती है और अपने अद्वितीय स्वाद के कारण लोकप्रीय है। इसे विशेष रूप से त्योहारों, विवाह समारोहों और अन्य शुभ अवसरों पर बनाया जाता है। इसकी मिठास और सादगी इसे हर पीढ़ी में लोकप्रिय बनाए रखती है।

 

इतिहास और उत्पत्ति

अरसे का इतिहास लगभग 1100 वर्ष पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि 9वीं सदी में जब जगद्गुरु शंकराचार्य ने बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरों की स्थापना की, तो उन्होंने दक्षिण भारत से ब्राह्मणों को पूजा-अर्चना के लिए आमंत्रित किया। ये ब्राह्मण अपने साथ ‘अरसालु’ नामक एक मिठाई लाए, जो लंबे समय तक खराब नहीं होती थी। धीरे-धीरे यह मिठाई स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय हो गई और ‘अरसा’ के नाम से प्रचलित हुई।

कुछ इतिहासकारों के अनुसार, अरसा का जिक्र कई पुराने ग्रंथों में भी मिलता है। इसे विशेष रूप से यात्रियों के लिए एक आदर्श भोजन माना जाता था, क्योंकि यह लंबे समय तक खराब नहीं होता। उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में इसे ‘यात्रा भोजन’ के रूप में भी जाना जाता है। पहले के समय में, जब बाजार में उपलब्धता सीमित थी, तो लोग अरसा बनाकर महीनों तक इसका उपयोग करते थे।

 

बनाने की विधि

अरसा बनाने के लिए चावल को साफ करके तीन दिनों तक पानी में भिगोया जाता है, जिसमें हर 24 घंटे में पानी बदला जाता है। इसके बाद चावल को सुखाकर दरदरा पीसा जाता है। इस चावल के आटे में गुड़, दही और घी मिलाकर आटा गूंथा जाता है। फिर इस आटे से छोटी-छोटी गोलियां बनाकर घी में सुनहरा होने तक तला जाता है।

आजकल कई लोग अरसे को ज्यादा कुरकुरा बनाने के लिए उसमें सूजी या थोड़ा सा मैदा मिलाते हैं। कुछ लोग इसे घी की जगह सरसों के तेल में तलते हैं, जिससे इसका स्वाद अलग तरह का हो जाता है। इसके अलावा, कुछ घरों में अरसे के स्वाद को और बढ़ाने के लिए इसमें इलायची पाउडर या तिल भी मिलाया जाता है।

 

विभिन्न नाम और क्षेत्रीय विविधताएं

उत्तराखंड में यह मिठाई ‘अरसा’ के नाम से जानी जाती है। दक्षिण भारत में इसे ‘अरिसेलु’ या ‘अरिसालु’ कहा जाता है। बिहार में भी इसी तरह की मिठाई बनाई जाती है, हालांकि वहां इसका नाम भिन्न हो सकता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे विशेष रूप से संक्रांति और अन्य त्योहारों पर बनाया जाता है। ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है, और इसकी रेसिपी में हल्के बदलाव किए जाते हैं।

इसके अलावा, नेपाल और तिब्बत में भी अरसे के समान ही मिठाई बनाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। यह दर्शाता है कि अरसा न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में एक लोकप्रिय मिठाई है।

 

सांस्कृतिक महत्व

अरसा उत्तराखंड की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। शादी-ब्याह, त्योहारों और अन्य शुभ अवसरों पर इसे बनाना शुभ माना जाता है। यह मिठाई महीनों तक खराब नहीं होती, जिससे इसे दूर-दराज के रिश्तेदारों को भेजना आसान होता है। पहले के समय में जब संचार और परिवहन की सुविधाएं इतनी विकसित नहीं थीं, तब लोग अरसे को एक महत्वपूर्ण उपहार के रूप में उपयोग करते थे।

गढ़वाल और कुमाऊं में, अरसे को विशेष रूप से ‘कौथिग’ (ग्राम मेले) और धार्मिक आयोजनों में प्रसाद के रूप में भी बांटा जाता है। लोग इसे अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ साझा करते हैं, जिससे आपसी संबंध और प्रेम बढ़ता है।

 

स्वास्थ्य लाभ

अरसे को पारंपरिक रूप से देसी घी और गुड़ से बनाया जाता है, जो इसे पोषण से भरपूर बनाता है। गुड़ में आयरन, कैल्शियम और मिनरल्स होते हैं, जो सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं। चावल कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। इसके अलावा, अरसे में मौजूद घी पाचन के लिए लाभदायक होता है।

हालांकि, आधुनिक दौर में लोग इसे कम तेल में बनाने के लिए बेक करने का तरीका भी अपना रहे हैं। कुछ लोग अरसे को शहद या खजूर के शक्कर से भी बनाने लगे हैं, जिससे यह और भी सेहतमंद बन जाता है।

 

निष्कर्ष

अरसा उत्तराखंड की एक पारंपरिक मिठाई है, जो न केवल स्वादिष्ट है बल्कि इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत गहरा है। यह मिठाई समय के साथ अनेक रूपों में बदलती रही है, लेकिन इसकी लोकप्रियता आज भी बनी हुई है। अरसा न केवल त्योहारों और खास मौकों की मिठास बढ़ाता है, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध परंपरा और विरासत का भी प्रतीक है।

 

 

Article by – Mohit Bangari

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