रम्माण महोत्सव: सलूड़-डुंगरा गाँव की अनूठी परंपरा

Mohit Bangari
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उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूड़-डुंगरा गांव में मनाया जाने वाला रम्माण महोत्सव हमारी संस्कृति, परंपरा, आस्था और लोककला का एक अनूठा संगम है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसमें हमारी समाज की एकता, नृत्य, संगीत और परंपरागत लोकनाट्य की झलक भी मिलती है।
मुझे गर्व है कि मैं सलूड़-डुंगरा गाँव से हूँ और इस अद्भुत महोत्सव का हिस्सा बनता आया हूँ। यदि आप उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और परंपराओं को करीब से देखना चाहते हैं, तो रम्माण महोत्सव में जरूर शामिल हों।
रम्माण महोत्सव का इतिहास और उत्पत्ति
यह महोत्सव भगवान राम के जीवन से जुड़े प्रसंगों को नृत्य-नाटिका के माध्यम से प्रस्तुत करता है। माना जाता है कि यह उत्सव 8वीं शताब्दी से मनाया जा रहा है, जब उत्तराखंड में वैष्णव परंपरा को बढ़ावा मिला और बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण हुआ।
यह त्योहार भूमियाल देवता को समर्पित है, जिन्हें गांव का रक्षक माना जाता है। माना जाता है कि भूमियाल देवता गांव की रक्षा करते हैं और इस उत्सव के माध्यम से उन्हें प्रसन्न किया जाता है।
कब और कैसे मनाया जाता है रम्माण महोत्सव?
त्योहार की सटीक तारीख (अप्रैल में होगी घोषणा)
रम्माण महोत्सव हर साल अप्रैल महीने में बैसाखी के 9वें या 11वें दिन के बाद मनाया जाता है। इस साल 2025 में, त्योहार की सटीक तारीख अप्रैल के मध्य में घोषित की जाएगी। गांव के पुजारी और प्रमुख बुजुर्ग पंचांग देखकर त्योहार की सही तिथि तय करते हैं।
मुख्य अनुष्ठान और कार्यक्रम
गणेश पूजन से शुरुआत होती है।
भूमियाल देवता की शोभायात्रा गांव में निकाली जाती है।
लोकनृत्य और लोकगायन का आयोजन होता है।
शाम को रामकथा और रामायण से जुड़ी कहानियों का मंचन किया जाता है।
मुखौटा नृत्य (Ramman Mask Dance) किया जाता है, जिसमें कलाकार भगवान राम, हनुमान, रावण और अन्य पौराणिक पात्रों का अभिनय करते हैं।
जागर और धार्मिक भजन-कीर्तन का आयोजन भी किया जाता है।
रम्माण महोत्सव के लोकनृत्य और मुखौटे
रम्माण महोत्सव की सबसे अनोखी परंपरा मुखौटा नृत्य है। इसमें कलाकार लकड़ी के भोजपत्र (बुरांश) वृक्ष से बनाए गए रंगीन मुखौटे पहनकर भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान, रावण और अन्य पौराणिक पात्रों की भूमिका निभाते हैं।
मुखौटे बनाने की परंपरा
ये मुखौटे पुरानी परंपराओं के अनुसार भोजपत्र वृक्ष की लकड़ी से बनाए जाते हैं।
मुखौटे हर साल रंगे और सजाए जाते हैं।
यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी गांव में संरक्षित की जा रही है।
लोकगीतों में विशेष रूप से “जागर” गाया जाता है, जिसमें लोकदेवताओं और महापुरुषों की गाथाएँ होती हैं। ढोल, दमाऊ, रणसिंघा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है।
गांव की सहभागिता और सामाजिक महत्व
रम्माण महोत्सव में संपूर्ण गांव की भागीदारी होती है।
ब्राह्मण पुजारी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते हैं।
युवा कलाकार मुखौटा नृत्य और नाट्य मंचन में भाग लेते हैं।
महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और प्रसाद तथा भोजन की व्यवस्था करती हैं।
यह पर्व गांव की सामाजिक एकता, कला और परंपराओं को जीवंत बनाए रखता है।
रम्माण महोत्सव में आने के लिए संपर्क करें – सलूड़-डुंगरा में हमारा होमस्टे उपलब्ध है
अगर आप रम्माण महोत्सव देखने आना चाहते हैं, तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं। हमारा परिवार सलूड़-डुंगरा गांव में होमस्टे सुविधा भी प्रदान करता है, जहाँ आप ठहर सकते हैं और इस अद्भुत सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बन सकते हैं।
कैसे पहुंचे?
निकटतम रेलवे स्टेशन: ऋषिकेश
निकटतम हवाई अड्डा: देहरादून (जॉली ग्रांट)
निकटतम बड़ा शहर: जोशीमठ (75 किमी दूर)
ऋषिकेश या देहरादून से जोशीमठ तक बस या टैक्सी लें, फिर सलूड़-डुंगरा पहुंच सकते हैं।
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मुझसे संपर्क करने के लिए आप मेरी वेबसाइट mohitbangari.com पर विजिट कर सकते हैं या मुझे सीधे कॉल या मैसेज कर सकते हैं।
Mobile/Whats app : + 91 8650838514
यूनेस्को द्वारा मान्यता और संरक्षण की आवश्यकता
रम्माण महोत्सव को 2009 में यूनेस्को द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) की सूची में शामिल किया गया था।
लेकिन, आधुनिकता और पलायन के कारण इस त्योहार को बचाने की ज़रूरत है। युवाओं को इस सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने के लिए डिजिटल प्रचार, पर्यटन और सरकारी सहयोग की आवश्यकता है।
सलूड़-डुंगरा का रम्माण महोत्सव सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा, लोककला और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण है। यह उत्सव हर साल हमारे गांव में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
मुझे गर्व है कि मैं सलूड़-डुंगरा गांव का निवासी हूँ और इस ऐतिहासिक महोत्सव का हिस्सा हूँ। यदि आप उत्तराखंड की अद्भुत लोकसंस्कृति और पौराणिक परंपराओं को करीब से देखना चाहते हैं, तो एक बार रम्माण महोत्सव में जरूर शामिल हों!
त्योहार की सही तारीख अप्रैल के मध्य में घोषित होगी। यदि आप आना चाहते हैं, तो मुझसे संपर्क करें।
जय भूमियाल देवता! जय सलूड़-डुंगरा!
Article by – Mohit Bangari
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