लोकदेवी झालीमाली – सदेई की अमर लोकगाथा, आस्था और उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति
– By Mohit Bangari

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उत्तराखण्ड की धरती सिर्फ बर्फीले पहाड़ों, नदियों और मंदिरों की भूमि नहीं है। यह लोकदेवताओं, लोककथाओं, जागरों और सदियों पुरानी आस्थाओं की भी भूमि है। यहाँ हर घाटी, हर गाँव और हर जंगल के पीछे कोई न कोई कथा जरूर छुपी होती है। इन्हीं लोकपरम्पराओं में एक बहुत महत्वपूर्ण नाम आता है — लोकदेवी झालीमाली का।
गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों क्षेत्रों के लोकसाहित्य में झालीमाली देवी का विशेष स्थान रहा है। पुराने समय में लोग देवी को सिर्फ एक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार की रक्षक, कुलदेवी और संकटों से बचाने वाली देवी मानते थे। आज भी उत्तराखण्ड के कई इलाकों में जागर, लोकगाथाओं और लोकगीतों में देवी का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है।
इस लेख के लिए मैंने प्रसिद्ध लेखक और लोकसंस्कृति शोधकर्ता अरुण कुकसाल जी की पुस्तक “हिमालय की लोकदेवी झालीमाली” का अध्ययन किया। इस महत्वपूर्ण लोकधरोहर को लिखित रूप में संरक्षित करने के लिए मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। उनके कार्य ने उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, लोकदेवियों और पुरानी गाथाओं को समझने में एक महत्वपूर्ण आधार दिया है।
झालीमाली देवी का जिक्र विशेष रूप से सदेई, रण रौत, सूरज नाग, राजुला मालूशाही और महारानी जिया जैसी प्रसिद्ध लोकगाथाओं में मिलता है। लोकविश्वास है कि देवी अपने भक्तों को सपनों में आकर आने वाले संकटों के बारे में पहले ही संकेत दे देती थी। यही कारण है कि पुराने समय में राजा-महाराजा भी युद्ध पर जाते समय देवी की जोत अपने साथ लेकर जाते थे।
इस लेख में हम झालीमाली देवी की लोकपरम्परा, उनके महत्व और सबसे प्रसिद्ध सदेई लोककथा के बारे में विस्तार से जानेंगे।
कौन हैं झालीमाली देवी?
उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति में कई ऐसी देवियाँ हैं जिनका उल्लेख धार्मिक ग्रन्थों से ज्यादा लोकसाहित्य में मिलता है। झालीमाली देवी भी उन्हीं में से एक हैं। उन्हें हिमालयी लोकदेवी, कुलदेवी और रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है।
गढ़वाल के पुराने राजवंशों में देवी की विशेष मान्यता थी। लोकगाथाओं में वर्णन मिलता है कि युद्ध के समय देवी की “जोत” साथ ले जाई जाती थी ताकि विजय प्राप्त हो सके। पहाड़ों में आज भी “जोत” सिर्फ दीपक नहीं मानी जाती, बल्कि देवी की जीवित शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
पुराने जागर गायक बताते हैं कि देवी अपने भक्तों के दुख, पीड़ा और संकट को पहले ही जान लेती थी। कई लोककथाओं में देवी सपनों में आकर मार्गदर्शन देती हैं। यही बात उन्हें अन्य लोकदेवियों से अलग बनाती है।
उत्तराखण्ड के लोकसाहित्य में झालीमाली
अगर हम गढ़वाल के लोकसाहित्य को ध्यान से देखें तो पाएँगे कि झालीमाली देवी सिर्फ धार्मिक कथा तक सीमित नहीं हैं। वह लोकजीवन का हिस्सा हैं। खेतों, जंगलों, धियाणियों की पीड़ा, भाई-बहन के प्रेम और पहाड़ी समाज की भावनाओं में देवी का रूप दिखाई देता है।
पुराने समय में जब संचार के साधन नहीं थे, तब पहाड़ की विवाहित बेटियाँ कई-कई वर्षों तक मायके नहीं जा पाती थीं। ऐसे समय में लोकगीत ही उनके मन की आवाज बनते थे। जंगलों में घास काटते समय, लकड़ी लाते समय या पानी भरते समय महिलाएँ लोकगीत गाती थीं। इन गीतों में देवी, मायका, भाई और पहाड़ की पीड़ा साथ-साथ चलती थी।
सदेई की कथा इसी लोकभावना की सबसे मार्मिक कहानियों में से एक है।
सदेई की लोककथा – पहाड़ की धियाणियों का दर्द
गढ़वाल में शायद ही कोई ऐसा गाँव होगा जहाँ सदेई की कथा न सुनी जाती हो। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि पहाड़ की बेटियों की पीड़ा, उनका अकेलापन और भाई के प्रति प्रेम की अमर गाथा है।
लोककथा के अनुसार, बहुत पुराने समय में पौड़ी गढ़वाल के राठ क्षेत्र में सदेई नाम की एक लड़की रहती थी। उसका विवाह कर्णप्रयाग क्षेत्र के चुला कठूड़ या थाती कठूड़ गाँव में कठैत परिवार में हुआ था।
सदेई अपने मायके की इकलौती संतान थी। विवाह के बाद वह ससुराल चली गई। लेकिन समय बीतता गया और मायके से कोई उसकी खबर लेने नहीं आया। पहाड़ के उस समय को समझना जरूरी है। तब न सड़कें थीं, न फोन और न ही जल्दी आने-जाने की सुविधा। कई बार धियाणियाँ वर्षों तक अपने मायके नहीं जा पाती थीं।
सदेई भी धीरे-धीरे मायके की “खुद” यानी याद में डूबने लगी।
सिलंग का पौधा और मायके की धार
लोककथा का यह भाग बहुत भावुक और प्रतीकात्मक माना जाता है। सदेई ने अपने ससुराल से मायके जाने वाले रास्ते में एक सिलंग का पौधा लगाया। उस स्थान से दूर उसके मायके की धार दिखाई देती थी। वह अक्सर उस पौधे के पास बैठती, उसकी देखभाल करती और दूर अपने मायके की तरफ देखती रहती।
यह दृश्य आज भी पहाड़ की लोकसंस्कृति में बहुत गहराई से महसूस किया जाता है। पहाड़ की बेटियाँ आज भी “मायके की धार” देखकर भावुक हो जाती हैं। लोकगीतों में यह दर्द बार-बार दिखाई देता है। चैत का महीना आता। गाँव की दूसरी बहुओं के भाई कलेवा लेकर आते। लेकिन सदेई का कोई नहीं आता। उसका दुख और बढ़ जाता।
तब वह सिलंग के पेड़ के पास जाकर अपनी कुलदेवी झालीमाली से प्रार्थना करती।
देवी से की गई प्रतिज्ञा
सदेई ने देवी से कहा कि अगर उसे भाई का सुख मिलेगा, तो वह देवी की हर इच्छा पूरी करेगी। यहाँ एक बात समझने वाली है। पहाड़ की लोकपरम्पराओं में देवी-देवताओं से “मनौती” या “वचन” माँगने की परम्परा बहुत पुरानी रही है। लोग अपने दुख और इच्छाएँ सीधे देवी के सामने रखते थे। कुछ समय बाद सदेई के मायके में एक पुत्र जन्मा। उसका नाम रखा गया — सदेऊ।
इधर सदेई के भी दो पुत्र हुए — उमरा और सुमरा। लेकिन समय बीतता गया। सदेई अब भी अपने मायके नहीं जा पाई।
सपने में देवी का आना
जब सदेऊ बारह वर्ष का हुआ, तब एक रात उसने सपने में अपनी बहन सदेई और झालीमाली देवी को देखा। उत्तराखण्ड की लोकपरम्परा में सपनों का विशेष महत्व है। कई लोककथाओं में देवी-देवता सपनों के माध्यम से संदेश देते हैं। इसे लोग देवी की कृपा मानते हैं। अगले दिन सदेऊ ने अपनी माँ से अपनी दीदी से मिलने की जिद की। माँ ने उसे सौगात देकर बहन के गाँव भेजा।
अब यहाँ से कथा एक कठिन पहाड़ी यात्रा का रूप ले लेती है। सदेऊ घने जंगलों, डांडों और बीहड़ रास्तों को पार करता हुआ अपनी बहन के गाँव पहुँचा। पहाड़ के पुराने रास्तों की कठिनाई आज के लोगों के लिए समझना आसान नहीं है। तब यात्राएँ कई दिनों में पूरी होती थीं।
भाई के आने की खुशी
जब सदेई ने पहली बार अपने भाई को देखा, तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हुई थी। उसका अपना भाई उसके घर आया था।
लेकिन तभी उसे अपनी प्रतिज्ञा याद आई। उसने देवी झालीमाली को अठ्वाड चढ़ाने की तैयारी शुरू की। लोकपरम्परा में अठ्वाड का अर्थ विशेष बलि परम्परा से जुड़ा हुआ माना जाता है, जिसमें सात बकरे और एक भैंसे की बलि दी जाती थी।
पुराने समय में हिमालयी क्षेत्रों में बलि परम्परा कई देवी-देवताओं की पूजा का हिस्सा रही है। हालाँकि आज समाज में इस पर अलग-अलग मत हैं, लेकिन लोककथाओं में इसका उल्लेख सामान्य रूप से मिलता है।
देवी की कठिन परीक्षा
जब सदेई बलि देने लगी, तब आकाशवाणी हुई कि देवी केवल पशुबलि से संतुष्ट नहीं होंगी। सदेई ने स्वयं को बलि देने की प्रार्थना की। लेकिन देवी ने स्त्री बलि स्वीकार नहीं की। देवी ने कहा कि या तो भाई की बलि देनी होगी या पुत्रों की। यह कथा का सबसे भावुक और कठिन भाग है।
सदेई अपने भाई को किसी भी हालत में खोना नहीं चाहती थी। वर्षों की प्रतीक्षा के बाद मिला भाई उसके लिए संसार से बढ़कर था। तब उसने अपने दोनों पुत्र — उमरा और सुमरा — देवी को समर्पित कर दिए यह प्रसंग आज भी जागरों में सुनाया जाता है और सुनने वालों की आँखें नम हो जाती हैं।
देवी की कृपा और चमत्कार
देवी झालीमाली सदेई के भाई प्रेम और त्याग से अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने सदेई से घर के भीतर जाने को कहा। जब सदेई घर के अंदर पहुँची, तो उसने देखा कि उसके दोनों पुत्र जीवित हैं। वे अपने मामा सदेऊ के साथ हँस-खेल रहे हैं। सदेई बार-बार देवी को धन्यवाद देने लगी।
यहीं से यह कथा अमर हो गई। गढ़वाल के जागरी और लोकगायक पीढ़ियों से इस कथा को गाते आ रहे हैं। आज भी गाँवों में जब सदेई की कथा गायी जाती है, तो पूरा वातावरण भावुक हो जाता है।
सदेई की कथा का सामाजिक महत्व
अगर इस लोककथा को गहराई से समझें, तो यह सिर्फ देवी कथा नहीं है। इसमें पहाड़ के समाज की पूरी तस्वीर दिखाई देती है। इस कथा में हमें दिखाई देता है:
- धियाणियों का अकेलापन
- मायके की याद
- भाई-बहन का प्रेम
- लोकदेवियों में आस्था
- जंगल और पहाड़ का जीवन
- पुराने समाज की बलि परम्परा
- और परिवार के लिए त्याग
यह कहानी पहाड़ की स्त्रियों की भावनाओं को बहुत गहराई से दिखाती है।
जागरों में झालीमाली देवी
उत्तराखण्ड में जागर सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह लोकइतिहास, स्मृति और सामूहिक चेतना का हिस्सा है। जब जागरी ढोल-दमाऊँ की थाप पर सदेई या झालीमाली की कथा गाते हैं, तो पूरा वातावरण बदल जाता है। लोग सिर्फ कहानी नहीं सुनते, बल्कि उसे महसूस करते हैं।
कई बुजुर्ग मानते हैं कि जागर के दौरान देवी की उपस्थिति अनुभव होती है। यही कारण है कि आज भी गाँवों में इन परम्पराओं का महत्व बना हुआ है।
आज के समय में झालीमाली देवी की परम्परा
समय बदल गया है। अब सड़कें हैं, मोबाइल हैं और लोग दूर-दूर तक आसानी से जा सकते हैं। लेकिन इसके बावजूद उत्तराखण्ड की लोककथाएँ आज भी जीवित हैं। हालाँकि नई पीढ़ी इन कथाओं से थोड़ा दूर होती जा रही है। यही कारण है कि इन लोकपरम्पराओं को लिखित रूप में सहेजना बहुत जरूरी हो गया है।
अगर आज हम इन कथाओं को नहीं बचाएँगे, तो आने वाले समय में पहाड़ की बहुत बड़ी सांस्कृतिक धरोहर खो सकती है।
निष्कर्ष
झालीमाली देवी और सदेई की कथा सिर्फ धार्मिक आख्यान नहीं है। यह उत्तराखण्ड की आत्मा का हिस्सा है। इसमें पहाड़ की धियाणियों का दर्द है, भाई-बहन का प्रेम है, लोकदेवियों में विश्वास है और हिमालयी समाज की संवेदनाएँ हैं।
जब भी गढ़वाल के किसी गाँव में ढोल-दमाऊँ की आवाज के साथ सदेई की गाथा गायी जाती है, तो ऐसा लगता है जैसे सदियों पुरानी हिमालयी स्मृतियाँ फिर से जीवित हो उठी हों।
यही उत्तराखण्ड की असली ताकत है — उसकी लोकसंस्कृति, उसकी लोककथाएँ और उसकी जीवित परम्पराएँ।
By Mohit Bangari
(30 April 2026)
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