पांडुकेश्वर की घंटी का अभिलेख: एक पुरानी घंटी से खुला उत्तराखंड के इतिहास का पन्ना
– By Mohit Bangari

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उत्तराखंड का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और राजधानियों की कहानी नहीं है। यहां इतिहास कई बार ऐसी छोटी-छोटी चीजों में छिपा मिलता है, जिन्हें हम सामान्य समझकर छोड़ देते हैं। किसी मंदिर की दीवार, पुराना ताम्रपत्र, शिलालेख या फिर कोई घंटी भी इतिहास का महत्वपूर्ण प्रमाण बन सकती है।
पांडुकेश्वर की एक पुरानी घंटी भी ऐसी ही है।
इस लेख को लिखने के लिए मैंने डॉ. शिव प्रसाद नैथानी की पुस्तक ‘उत्तराखण्ड का सांस्कृतिक इतिहास’ में दिए गए इस पूरे प्रसंग को आधार बनाया है। डॉ. नैथानी ने पांडुकेश्वर की इस घंटी के बारे में बहुत दिलचस्प अनुभव लिखा है। इसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम खुद उनके साथ उस पुराने घंटे को देखने पांडुकेश्वर पहुंच गए हों।
मामला सिर्फ एक पुरानी घंटी मिलने का नहीं था। असली बात तो तब सामने आई, जब उस घंटी को साफ किया गया और पता चला कि उसके दोनों तरफ अलग-अलग अभिलेख लिखे हुए हैं।
एक तरफ फारसी लिपि थी और दूसरी तरफ देवनागरी लिपि।
दोनों अभिलेखों में अकबर का उल्लेख था। लेकिन तारीख को लेकर एक बड़ी गड़बड़ सामने आ रही थी। इसी गड़बड़ को समझने के लिए डॉ. नैथानी ने खुद इस घंटे की जांच की।
पांडुकेश्वर में मिली वह पुरानी घंटी
डॉ. शिव प्रसाद नैथानी लिखते हैं कि बद्रीनाथ से लौटते हुए वे सितंबर 1977 में पांडुकेश्वर में रुक गए। उनका उद्देश्य इस पुराने घंटे को ढूंढना और उसके लेख की जांच करना था।
लेकिन घंटा किसी संग्रहालय या मंदिर के सुरक्षित कमरे में नहीं रखा था।
वह एक स्थानीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में इस्तेमाल हो रहा था।
उस समय विद्यालय में घंटी बजाने के लिए दूसरी घंटी नहीं थी। इसलिए इस पुराने घंटे को विद्यालय को दे दिया गया था।
डॉ. नैथानी को पुजारी जी को साथ लेकर विद्यालय जाना पड़ा। वहां के प्रधानाचार्य ने सहयोग किया और बल्ली से टंगे हुए घंटे को उतरवाकर उनके सामने रख दिया।
यहां से एक रोचक ऐतिहासिक खोज शुरू हुई।
उस समय विद्यालय के लोगों को भी इस घंटे पर लिखे पुराने लेख के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उनके लिए वह एक घंटी थी, जिसे रोज स्कूल में बजाया जाता था।
राजुला-मालूशाही
उत्तराखंड के इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए यहां की लोककथाओं को जानना भी उतना ही जरूरी है। पहाड़ों की कई कहानियां पीढ़ियों से लोगों की जुबान पर चली आ रही हैं। राजुला-मालूशाही भी ऐसी ही प्रसिद्ध लोकगाथा है, जिसमें प्रेम, संघर्ष और पहाड़ी समाज की झलक मिलती है। पांडुकेश्वर की घंटी के अभिलेख हमें उत्तराखंड के पुराने इतिहास से जोड़ते हैं, वहीं राजुला-मालूशाही जैसी लोकगाथाएं हमें उस समाज की सांस्कृतिक यादों से जोड़ती हैं। मैंने राजुला-मालूशाही की पूरी कहानी और उससे जुड़े पहलुओं को अलग लेख में विस्तार से लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।
घंटी के अक्षर लगभग मिट चुके थे
डॉ. नैथानी बताते हैं कि लगभग एक-दो साल से उस घंटे को लकड़ी की मुंगरी से बजाया जा रहा था। लगातार चोट पड़ने के कारण उसके बीच का हिस्सा चमकीला हो गया था।
इसका असर उस पर लिखे पुराने लेख पर भी पड़ा। प्राचीन लेख के कुछ अक्षर मिट चुके थे। इसलिए उसे पढ़ना आसान नहीं था। घंटी को साफ करने का काम शुरू किया गया। इसके लिए अल्मोड़ा घास का इस्तेमाल किया गया। पुराने समय में तांबे के बर्तनों को साफ करने के लिए इस तरह की घास का इस्तेमाल किया जाता था। डॉ. नैथानी इस मौके पर अल्मोड़ा घास के बारे में भी एक रोचक जानकारी देते हैं।
कुमाऊं के प्रसिद्ध कटारमल सूर्यदेवता मंदिर में रोज होने वाले बड़े भोग के तौले और डेग भी इसी अल्मोड़ा घास से मांजे जाते थे। यह घास खगमरा कोट धार से आती थी। डॉ. नैथानी के अनुसार बाद में इसी घास के कारण उस धार के नगर का नाम अल्मोड़ा पड़ा।
यानी एक पुरानी घंटी को साफ करते-करते उत्तराखंड की स्थानीय परंपरा और स्थानों के नाम से जुड़ी एक दूसरी कहानी भी सामने आ जाती है।
घंटी के दोनों तरफ लिखे थे अभिलेख
जब एक तरफ की सफाई हो गई तो सोचा गया कि दूसरी तरफ से भी घंटी को मांज लिया जाए।
लेकिन दूसरी तरफ सफाई करते ही एक और लेख दिखाई दिया।
यह देवनागरी लिपि में था।
डॉ. नैथानी ने पुस्तक में इस पूरे देवनागरी अभिलेख को इस प्रकार दिया है—
“राजु साहि अकबर कौ। स्त्री नरसिंहा संवतु १६२७ वरषे माग्र सुहि पूर्न मास १५ घना वनिगढ़ही गुस ईठी नरा ई नेगानि मय पुनी के रेमसजुं सनय छठी फरीहो गठित ठा: नरः हीनु घट मसुतु लिखित पं नामु सुकुल सुभ मसा से।”
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ऊपर दिया गया पाठ मूल पुस्तक में जिस तरह देवनागरी में पढ़ा और प्रकाशित किया गया है, उसी रूप में रखा गया है। इसे आज की सामान्य हिन्दी में बदलना सही नहीं होगा, क्योंकि यह उस समय की भाषा और लेखन शैली का अभिलेखीय पाठ है।
इस लेख में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “संवतु १६२७” है।
यही संख्या आगे इस पूरे मामले को समझने में सबसे ज्यादा काम आती है।
घंटी के दूसरी तरफ था फारसी अभिलेख
घंटी के दूसरी ओर फारसी लिपि में भी एक लंबा लेख था। पुस्तक में उसका पाठ इस प्रकार दिया गया है—
“हिजरी ६७८ फगासी, जिलाले-इ-अल्लाह, अकबर बादशाह गाजी।”
इसके आगे फारसी लेख में लिखा है—
“ई साइस्तनामा दर महेल जिलाले इ अल्लाह अकबर बादशाह गाजी
राशकुनानोद शुद फर्द मा विशाव वा तारीख तेरा रोज सेसदा सन हिजरी ६७८ न
अर बादशाही के दर द्वारा तलके, अदसू देहली वासद कुहरबान अवन फतत हस्थी
नदावन कर खयास नाफन दूदा ना रासा कर दह नराईन दास कारीगर इब्न खातम
दास कारीगर।”
फारसी लेख में अकबर बादशाह का नाम साफ दिखाई देता था। इसलिए यह लेख अकबर के समय से जुड़ा हुआ माना गया।
लेकिन यहां एक बड़ी समस्या थी।
जीतू बगड़वाल
उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान केवल पुराने अभिलेखों और ऐतिहासिक प्रमाणों तक सीमित नहीं है। यहां कई लोककथाएं आज भी लोगों की आस्था और परंपराओं का हिस्सा हैं। जीतू बगड़वाल की कहानी इसका एक अच्छा उदाहरण है। बांसुरी बजाने वाले जीतू बगड़वाल की लोकगाथा खैत पर्वत, आंछरियों और रोपाई की परंपरा से जुड़ी हुई है। समय के साथ जीतू बगड़वाल को लोकदेवता के रूप में भी पूजा जाने लगा। मैंने उनकी पूरी लोकगाथा और उससे जुड़ी मान्यताओं के बारे में एक अलग लेख लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।
तारीख ने पूरी कहानी उलझा दी
फारसी लेख में हिजरी ६७८ लिखा था।
अगर इस तारीख को सही मान लिया जाए तो यह अकबर के समय से बहुत पहले की तारीख बनती है। अकबर तो 16वीं शताब्दी में भारत का शासक था।
इसलिए सवाल उठा कि आखिर गलती कहां हुई?
क्या फारसी लेख में तारीख गलत थी?
क्या किसी ने बाद में इसकी प्रतिलिपि बनाते समय अंक गलत पढ़ लिया?
या फिर मूल घंटे पर ही अंक गलत लिखे गए थे?
यही सवाल डॉ. नैथानी के सामने भी था।
उन्होंने सिर्फ किताब में लिखी तारीख को देखकर बात खत्म नहीं की। वे खुद पांडुकेश्वर गए और उस घंटे को खोजकर देखा।
देवनागरी अभिलेख ने दी नई जानकारी
अब दूसरी तरफ लिखे देवनागरी लेख को देखिए।
उसमें साफ तौर पर संवत १६२७ लिखा है।
विक्रम संवत १६२७ से ५७ घटाने पर १५७० ईस्वी प्राप्त होता है।
इसका मतलब हुआ कि देवनागरी अभिलेख की तारीख लगभग 1570 ईस्वी की है।
अब यह तारीख अकबर के शासनकाल से मेल खाती है।
यहीं से पूरी गुत्थी कुछ हद तक सुलझने लगी।
अगर घंटी का देवनागरी लेख 1570 ईस्वी के आसपास का है और उसमें अकबर का नाम भी आता है, तो फारसी लेख में लिखी हिजरी 678 की तारीख सही नहीं हो सकती।
यानी फारसी लेख की तारीख पढ़ने या उसकी प्रतिलिपि तैयार करने में कहीं गलती हुई थी।
फारसी लेख को पढ़ने में भी परेशानी हुई
आज हम किसी पुराने लेख को समझने के लिए इंटरनेट की मदद ले सकते हैं। लेकिन डॉ. नैथानी के समय पुरानी फारसी पढ़ने वाले जानकार आसानी से नहीं मिलते थे।
उन्होंने लिखा है कि उन्नीसवीं सदी तक भारत में फारसी पढ़ने-लिखने वालों की अच्छी संख्या थी। उस समय “पढ़े फारसी, बेचे तेल” जैसी कहावत भी चलती थी।
लेकिन समय के साथ पुरानी फारसी पढ़ने वाले लोग कम होते गए।
पांडुकेश्वर की घंटी के लेख को समझने के लिए एक मुस्लिम प्रोफेसर और मेरठ के कई मुस्लिम वकीलों को भी यह लेख दिखाया गया। श्रीनगर के विश्नोई परिवार से मिले दस्तावेज भी उनके सामने रखे गए।
लेकिन सभी ने इसे पुरानी फारसी बताते हुए पढ़ने में असमर्थता जताई।
रवांई और जौनपुर से कुछ पुराने उर्दू अक्षर भी लाए गए। फिर भी पुरानी फारसी या अरबी जानने वाला कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जो इस लेख को ठीक से पढ़ सके।
यह हिस्सा पढ़ते हुए समझ आता है कि पुराने अभिलेखों को सुरक्षित रखना जितना जरूरी है, उन्हें पढ़ने की परंपरा को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
डॉ. नैथानी ने तारीख की फिर से जांच की
फारसी लेख की तारीख को लेकर भ्रम था। इसलिए उसके अंकों की प्रतिलिपि मेरठ में एक बुजुर्ग सिंधी अर्जनवीस को दिखाई गई।
जब उसने उसे हिजरी ६७८ पढ़ा तो समस्या फिर सामने आ गई।
क्योंकि यह तारीख अकबर के समय से मेल नहीं खाती थी।
दूसरी तरफ देवनागरी लेख में संवत १६२७ था। इसका ईस्वी रूप 1570 के आसपास आता था।
इसलिए देवनागरी लेख के आधार पर फारसी लेख की तारीख को भी इसी समय के आसपास माना गया।
डॉ. नैथानी के अनुसार फारसी लेख में जिस तारीख को ६७८ पढ़ा गया था, वहां वास्तव में ६७९ या ९७७ जैसे अंक होने की संभावना पर भी विचार किया गया। पुस्तक में इस तारीख को लेकर विस्तार से यही ऐतिहासिक उलझन समझाई गई है।
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि किसी अभिलेख के केवल एक अंक को देखकर पूरा इतिहास तय नहीं किया जा सकता। दूसरे प्रमाणों को भी साथ देखना पड़ता है।
एक घंटी ने इतिहासकार को जमीन पर उतरने के लिए मजबूर किया
मुझे डॉ. नैथानी की इस पूरी घटना का यह हिस्सा सबसे ज्यादा रोचक लगता है।
वे केवल पुस्तकालय में बैठकर इस अभिलेख पर चर्चा नहीं कर रहे थे।
उन्होंने बद्रीनाथ से लौटते हुए पांडुकेश्वर में रुकने का फैसला किया।
घंटी को ढूंढा।
पता चला कि वह स्कूल में लगी है।
पुजारी जी को साथ लेकर स्कूल पहुंचे।
प्रधानाचार्य से बात की।
बल्ली से घंटी उतरवाई।
फिर उसे साफ किया गया।
घिसे हुए अक्षरों को पढ़ने की कोशिश की गई।
और जब दूसरी तरफ भी लेख मिला तो पूरा मामला और दिलचस्प हो गया।
एक तरफ फारसी थी।
दूसरी तरफ देवनागरी।
और दोनों को साथ पढ़ने पर तारीख को लेकर उठे सवाल का जवाब मिलने लगा।
यह किसी इतिहास की किताब का सूखा तथ्य नहीं लगता। यह एक ऐसी घटना लगती है जिसमें एक इतिहासकार खुद मैदान में जाकर पुराने प्रमाण को देख रहा है।
घंटी को सुरक्षित रखने की भी चिंता हुई
अभिलेख मिल जाने के बाद काम खत्म नहीं हुआ था।
अब उसे सुरक्षित रखना भी जरूरी था।
डॉ. नैथानी ने बद्रीनाथ समिति को इस बारे में जानकारी देने का प्रयास किया। मंदिर के मुख्य कार्याधिकारी श्री गणेश प्रसाद जी उनके पुराने मित्र थे। उन्हें तत्काल जानकारी दी गई और घंटे को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई।
यह भी जरूरी था क्योंकि वह घंटी पहले से ही विद्यालय में इस्तेमाल हो रही थी।
अगर डॉ. नैथानी वहां नहीं जाते तो शायद लंबे समय तक किसी को पता ही नहीं चलता कि उस साधारण सी दिखने वाली घंटी पर दो पुराने अभिलेख लिखे हैं।
और लगातार इस्तेमाल से उन अक्षरों का और ज्यादा हिस्सा मिट सकता था।
पांडुकेश्वर की घंटी का महत्व
पांडुकेश्वर की यह घंटी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके दोनों ओर अलग-अलग लिपियों में लेख हैं।
एक ओर फारसी लिपि है।
दूसरी ओर देवनागरी लिपि है।
फारसी लेख में अकबर बादशाह का उल्लेख मिलता है। वहीं देवनागरी लेख में संवत १६२७ का उल्लेख मिलता है।
इन दोनों को साथ पढ़ने पर लगभग 1570 ईस्वी का समय सामने आता है।
इससे हमें उस दौर के इतिहास को समझने में मदद मिलती है। साथ ही यह भी पता चलता है कि पुराने अभिलेखों को पढ़ते समय कितनी सावधानी की जरूरत होती है।
किसी अंक की गलती पूरे इतिहास की तारीख बदल सकती है।
डॉ. नैथानी ने इसी बात को पांडुकेश्वर की घंटी के उदाहरण से समझाया है।
इस घटना से एक और बात समझ आती है
आज उत्तराखंड में कई पुराने मंदिर, ताम्रपत्र, शिलालेख और दूसरी ऐतिहासिक वस्तुएं गांवों और दूर-दराज के इलाकों में मौजूद हैं।
कई बार स्थानीय लोगों को इनके महत्व की पूरी जानकारी नहीं होती।
पांडुकेश्वर की घंटी भी एक समय स्कूल में सामान्य घंटी की तरह इस्तेमाल हो रही थी।
इसमें कोई बुराई नहीं थी, क्योंकि उस समय शायद किसी को इसकी ऐतिहासिक अहमियत पता ही नहीं थी। लेकिन यह घटना बताती है कि अगर ऐसे पुराने प्रमाणों की समय रहते पहचान और सुरक्षा नहीं हुई तो वे धीरे-धीरे नष्ट हो सकते हैं।
घंटी पर लगातार पड़ने वाली लकड़ी की मुंगरी की चोट से उसके अक्षर मिटने लगे थे।
अगर डॉ. नैथानी उस समय वहां नहीं पहुंचते तो शायद लेख का और हिस्सा नष्ट हो जाता।
डॉ. शिव प्रसाद नैथानी की किताब से मिली यह कहानी
मैंने इस पूरे प्रसंग को डॉ. शिव प्रसाद नैथानी की पुस्तक ‘उत्तराखण्ड का सांस्कृतिक इतिहास’ से पढ़ा है। इसीलिए इस लेख में पांडुकेश्वर की घंटी से जुड़ी घटना को उसी संदर्भ में रखा गया है, जिस तरह डॉ. नैथानी ने इसे अपने शोध और अनुभव के आधार पर लिखा है।
मुझे इस प्रसंग की सबसे खास बात यह लगी कि डॉ. नैथानी ने सिर्फ अभिलेख का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने यह भी बताया कि वे उसे देखने कैसे पहुंचे, घंटी कहां मिली, उसकी हालत कैसी थी और लेख को पढ़ने में किन परेशानियों का सामना करना पड़ा।
यही चीज किसी पुराने इतिहास को हमारे लिए ज्यादा जीवंत बना देती है।
हम अक्सर इतिहास की किताबों में सिर्फ यह पढ़ते हैं कि फलां जगह पर फलां शिलालेख मिला और उससे यह जानकारी प्राप्त हुई।
लेकिन पांडुकेश्वर की घंटी की कहानी में हमें उसके पीछे की पूरी मेहनत दिखाई देती है।
एक पुरानी घंटी।
एक स्कूल।
एक पुजारी।
एक प्रधानाचार्य।
लकड़ी की मुंगरी से पड़ते पुराने निशान।
अल्मोड़ा घास से घंटी की सफाई।
घिसे हुए अक्षर।
एक तरफ फारसी लेख।
दूसरी तरफ देवनागरी लेख।
और फिर तारीख को लेकर शुरू हुई जांच।
यही वजह है कि पांडुकेश्वर की घंटी का यह प्रसंग उत्तराखंड के सांस्कृतिक इतिहास में एक अलग जगह रखता है।
आखिर पांडुकेश्वर की घंटी हमें क्या बताती है?
पांडुकेश्वर की यह घंटी केवल पूजा में इस्तेमाल होने वाली पुरानी वस्तु नहीं है। इसके दोनों तरफ लिखे अभिलेख इसे ऐतिहासिक प्रमाण बना देते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस घटना से हमें इतिहास को जांचने का तरीका भी सीखने को मिलता है।
अगर किसी अभिलेख में तारीख दी गई है तो उसे तत्काल सही मान लेना जरूरी नहीं है।
उस तारीख को उस समय के शासक, भाषा, लिपि और दूसरे ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ मिलाकर देखना चाहिए।
पांडुकेश्वर की घंटी के मामले में भी यही हुआ।
फारसी लेख की तारीख और अकबर का शासन आपस में मेल नहीं खा रहे थे। फिर देवनागरी अभिलेख सामने आया। उसमें संवत १६२७ मिला। इस संवत से 1570 ईस्वी की तारीख निकलती है। इसके बाद फारसी लेख की तारीख पर दोबारा विचार करना पड़ा।
यानी एक छोटी सी घंटी ने इतिहासकार को एक बड़ी ऐतिहासिक गुत्थी सुलझाने का मौका दिया।
और शायद यही इस पूरी कहानी की सबसे खास बात है।
इतिहास हमेशा बड़ी इमारतों में नहीं मिलता।
कभी-कभी वह गांव के किसी पुराने मंदिर में टंगी एक घंटी पर भी लिखा होता है।
पांडुकेश्वर की यह घंटी इसका बहुत अच्छा उदाहरण है।
और डॉ. शिव प्रसाद नैथानी के साथ जुड़ा यह पूरा प्रसंग हमें याद दिलाता है कि उत्तराखंड के इतिहास को समझने के लिए केवल किताबें पढ़ना ही काफी नहीं है। कभी-कभी पुराने प्रमाणों तक खुद पहुंचना पड़ता है, उन्हें छूकर देखना पड़ता है और फिर उनके हर अक्षर को समझने की कोशिश करनी पड़ती है।
रामी बौराणी
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें पहाड़ के लोगों का जीवन, रिश्ते, विश्वास और भावनाएं दिखाई देती हैं। रामी बौराणी की लोककथा भी ऐसी ही कहानी है। यह रामी के प्रेम, धैर्य और अपने पति के प्रति विश्वास की कहानी है। चमोली के रामणी गांव से जुड़ी यह कथा आज भी लोकगीतों और स्थानीय परंपराओं में सुनाई देती है। इस तरह की लोककथाएं हमें इतिहास के साथ-साथ उस समय के सामाजिक जीवन को समझने में भी मदद करती हैं। मैंने रामी बौराणी की पूरी कहानी और उससे जुड़े लोकगीत के बारे में अलग लेख में विस्तार से लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।
By Mohit Bangari
(17 August 2026)
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